आत्महत्या:अपनों पर दवाब
By Deepak Kumar Agrawal
कितने बोझ को झेलूंगा मैं,
पढ़ाई के इस दौर में खुद को कैसे ठेलूँगा मैं,
परिणाम आने पर जो असफलता मिलेगी,
उससे कैसे उलझूँगा मैं।
भरोशा परिवार ने हमेशा दिखाया था,
ज़िन्दगी कठिन पर लड़ना सिखाया था,
पर असफलता की उस गिरवाट को जबभी देखता,
तब डर ने मुझे सताया था।
दुनिया क्या बोलेगी/लोग क्या बोलेंगे,
इसका डर नही था मुझे,
माता-पिता का जो निरादर होगा,
उसका बहुत अफसोस था मुझे।
इतने उम्मीद उन्होंने जताया था,
कितना भरोशा मुझ पर दिखाया था।
उनके कर्जो को मैं कैसे भूल गया,
कबसे मैं इतना खुदगर्ज़ बन गया।
उन्होंने हमेशा गर्व से कहा होगा,
आत्महत्या करले उतना कमजोर नही है मेरा बेटा,
अपने परिवार को पीछे अकेला छोड़ दे,
इतना बेदर्द नही है मेरा बेटा।
हौसला कर वो फिर चलेगा,
लड़खड़ायेगा पर अपनो को देख फिर उठ जाएगा,
ताने भले ही हम सुन रहे हो,
पर उसका हर हिसाब वो लोगो को कामयाबी से चुकाएगा।
पर उन्हें क्या पता,
असफलता का परिणाम आते ही,
मैं पीछे लटकने की तैयारी कर रहा था,
एक परिणाम को आखरी समझकर,
खुद को कोस्ता जा रहा था।
परिवार का ख्याल उस वक़्त आया नही,
मौत के अलावा और कुछ सोच पता ऐसा सोच पाया नही।
मेरी मौत तो खुद मैंने ली थी,
पर ऊपर जाकर माता-पिता से मुलाक़ात होगी ऐसा तो सोच पाया नही।
By Deepak Kumar Agrawal

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