आत्मकथा
By Gunjan Singh
कितना एहमकाना है ना
दिल से सोचना
सोच को बुनना
और उस बुने हुए लिहाफ
से दिमाग को ढ़क कर
इश्क कर लेना,
अकेले ही वो महसूस
कर लेना जो
दुनिया इश्तहार
के इंतजार में करती है,
नाउम्मीदी की कश्ती
में चढ़कर, खारे
समुंदर को पार कर लेना
और प्यास को तब तक
अपने भीतर जमींदोज
रखना जब तक
बारिश नहीं हो जाती
रेगिस्तान में,
बारिश शायद हो भी जाए
पर उस भार का सार
या तो जिंदादिल कर जाए
या नमक के मिठास
की तलब लग जाए
और इस भ्रम में तब तक
जीना जब तक मिठास
सच में जुबान न छू जाए,
तुम्हे एहमकाना लगता है वो
जो किसी की आत्मकथा बन चुका है।।
By Gunjan Singh

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