आटा-साटा
Updated: Jun 8, 2023
By Priyanka Dewna
दरू-दरू तक सुनाई देती हैं शहनाई की आवाज़
जब भी घर में आता है शादी का त्योहार,
घर की सभी औरतें मंगल गीत गाती है
बच्चों की ककलकाररयां घर का कोना-कोना भर जाती है,
आपस में सभी प्यार बरसाते हैं
लड़का/लड़की जब अपना नया घर बसाते है।
लेककन इन सारी खुशशयों में ववष घुल जाता है
जब ‘आटा-साटा’ की कुप्रथा का प्रकोप शादी जैसे पाक बंधन पर छाता है।
यह एक ऐसी प्रथा का माया जाल हैं
जजसमें बेटे की शादी के शलए बेटी को बशल का बकरा बनाया जाता है,
इसके जहरीले पंजों के नीचे ‘लड़की के बदले लड़की’
का लेन-देन कराया जाता हैं।
ररश्तों की नींव में धंधे की गंध छाने लगती हैं
जब बेटा-बेटी की खुशशयों से ऊपर जजमेदाररयों की लोह हावी होने लगती है,
किर क्या सही,क्या गलत
नज़र आता है तो बस वो लेन-देन का पथ।
‘ लड़का ककतना योग्य है, उम्र की ककस मोड़ पे है
लड़की ककतनी गुणवान है, नाबाशलग़ है या पररपक्वता के आखखरी छोर पे है ’
इन सब बातों का किर कोई मोल नहीं रह जाता है जब सामान की तरह इंसान को ही अदल-बदल ददया जाता
है। इस कुप्रथा के जंजाल में शसिफ बेदटयों को ही नहीं बजकक बेटों को भी भारी मोल चुकाना पड़ जाता है, जब कच्ची उम्र में सपनों की पतंग छोड़
जजमेदाररयों की पक्की डोर में उन्हें उलझा ददया जाता हैं,
किर जैसे ही सपनों का डोर उनके हाथों से छूट जाता हैं, तो कई बार वो इंसान ही टूट जाता हैं। इसशलए अब बहुत हो चुका ररश्तों का व्यापार
अब ररश्तों को ररश्तों की तरह ननभाया जाएगा,
अब घर आंगन में शहनाई तभी बजेगी
जब लड़का-लड़की की इसमें ददल से हामी होगी।
सही उम्र, सही साथी
तभी होगी अब शादी,
समाज को अब सरकार के साथ शमल कर आगे कदम बढाना होगा,
शायद हमारे एक नेक कदम से थोड़ी सी ही सही लेककन जथथर हो जाए, हमारे राज्य की आबादी।
By Priyanka Dewna

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