आज़ादी की ७५ वीं वर्षगाँठ
By Rachana Mallick
आज़ादी की ७५ वीं वर्षगाँठ के इस पावन अवसर पर प्रत्येक भारतवासी का हृदय से अभिनंदन। देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है । जन-जन हर्षित है ..,गौरान्वित है और अनुगृहीत भी है। स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्येक सेनानी के प्रति कृतज्ञता के भाव से अभिभूत है। न जाने कितने ही वीरों के त्याग एवं बलिदान की भूमि पर आज का भारत खड़ा है। वीर जिनका नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों से अंकित है …,वीर जिनकी गौरव गाथाएँ सुन-सुन कर हम बड़े हुए …,और अगणित वीर जिनका कोई परिचय नहीं..,इतिहास के पन्नों पर जो केवल एक जनसमूह हैं ..,वीर जिन्होंने स्वतंत्रता के स्वप्न को अपने ख़ून पसीने से सींचा..।वो अज्ञात अजान वीर जो कभी लाठी का प्रहार सह रहे थे। आहत प्रतिहत होकर भी वन्दे मातरम् का उद्घोष कर रहे थे..।सुर में सुर मिला स्वराज्य का अधिकार माँग रहे थे ..,जेल की सलाख़ों के पीछे से अंग्रेजों को चुनौती दे रहे थे.. ।अज्ञात बेनाम सेनानी जिनका नाम समय की धुँध में विलीन हो गया किंतु जिनका अस्तित्व अजर अमर है..।हमारे हृदय की गहराइयों में कहीं न कहीं इन बेनाम वीरों की धुंधली सी छवि आज भी जीवित है .., उनकी स्मृति जीवित है।
स्मृति उनके जुनून की.., स्मृति उनके साहस की..! स्मृति उनकी पीड़ा की.., स्मृति उनके शोषण की..।अंग्रेज़ जिसको डिगा न पाए स्मृति उनके दृढ़संकल्प की…, ।आम आदमी के विद्रोह की स्मृति.., आम आदमी के अदम्य साहस की स्मृति.।
स्मृति की वीथिकाओं में इन वीरों के रिसते हुए घाव भी हैं..,इनकी आहें भी हैं..। इनकी हुंकार भी है इनकी ललकार भी है।
इनकी प्रत्येक स्मृति को नमन। इनके जुनून को नमन। इनके जज़्बे को नमन। असहयोग आंदोलन में मौन प्रतिवाद एवं परित्याग करने वाले प्रत्येक सेनानी को नमन। अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली का बहिष्कार करने वाले हर बच्चे , हर नौजवान को नमन..,अंग्रेज़ी सरकार की नौकरी का परित्याग कर ग़ुलामी की ज़ंजीरें उतार कर फेंक देने वाले हर सेनानी को नमन..।विदेशी सामान की होली जला स्वदेशी का व्रत धारण करने वाले हर सेनानी को नमन..।अंग्रेजों द्वारा लगाए गए करों की अवज्ञा कर अंग्रेज़ी सरकार को चुनौती देने वाले हर सेनानी को नमन..।असहयोग एवम् अवज्ञा से शक्तिशाली अंग्रेज़ी सरकार की नींव हिला कर रख देने वाले हर भारतवासी को नमन।दांडी यात्रा में गाँधीजी के पीछे चलने वाले उस अपार जनसमूह को नमन। समुद्र के पानी से नमक बना अंग्रेजों के अहंकार को धूल में मिला देने वाले हर सेनानी को नमन। जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर की गोलियों से छलनी हुए हर सेनानी को नमन..।भारत-छोड़ो के नाद से जमीं-आसमाँ को हिला कर रख देने वाले हर सेनानी को नमन।स्वतंत्रता संग्राम के उस भीषण दावानल में अपनी संतान की आहुति देने वाली प्रत्येक माता को नमन..। ‘तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ सुभाषचंद्र बोस के आहवान पर अपने ही ख़ून से होली खेलने वाले उन मतवालों को नमन..।
आज अवसर है स्वतंत्रता संग्राम के सभी वीरों को आभार सुमन अर्पित करने का ..,रक्तरंजित अश्रुरंजित इन स्मृति वीथिकाओं में आभार दीप प्रज्वलित करने का ।अवसर है उनके सपनों के भारत के नवनिर्माण का नवसंकल्प धारण करने का ।अवसर है पुनः आत्म विश्लेषण करने का ।अवसर है कुप्रथाओं एवं कुरीतियों की बेड़ियों को काट प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का।जिन वीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर आज़ादी का मूल्य चुकाया..,अपने जीवन का बलिदान दे स्वतंत्रता संग्राम को सशक्त बनाया ..अवसर है उन वीरों का ऋण चुकाने का ।अवसर है पुनः राष्ट्र धर्म की प्रतिज्ञा लेने का ।देशसेवा का व्रत धारण करने का।बंधुत्व एवं सहिष्णुता के भाव को आत्मसात् करने का। पूर्ण निष्ठा एवम् सामर्थ्यानुसार देश के नवनिर्माण हेतु कृतसंकल्प होने का..।
देश का बच्चा-बच्चा शिक्षित हो स्वस्थ हो ।देश की हर बेटी के चेहरे पर मुस्कान हो। उसके अधिकारों का समाज अथवा घर-परिवार में हनन न हो ।किसान और मजदूर सुखी समुन्नत हों..उनके श्रम का सम्मान हो। किसी का शोषण न हो ..,।आपसी भाईचारे एवं सौहार्द की हम विश्व में मिसाल बनें। विश्व शान्ति के हम अग्रदूत बनें..।बुद्ध एवं नानक की भूमि से अहिंसा एवं मैत्री का पुनः शंखनाद हो ..! त्याग और तप की इस तपोभूमि से अखिल विश्व दया एवं करुणा का पावन संदेश पाए। सहिष्णुता की इस जननी पर सभी धर्म निर्भय निर्द्वंद्व फलें फूलें..। प्रत्येक हृदय में मानवता का अखण्ड दीप प्रदीप्त रहे।
हम जागरूक रहें .. । राष्ट्र उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें । अथक परिश्रम करें..। अन्वेषण करें..,नित नई खोज करें.. ।कला की अभिव्यक्ति हेतु प्रत्येक कलाकार को भव्य एवं उत्कृष्ट मंच प्रदान करें। कला भयभीत न हो ..निर्द्वंद्व बहे..।
अपनी प्राकृतिक सम्पदा का हम जी जान से रक्षण करें..। अपनी नदियों वनों एवं पर्वतों के संरक्षण हेतु कृतसंकल्प रहें..।अपने जीव जंतुओं से स्नेह भाव रखें।मातृभूमि की हर चुनौती का डट कर सामना करें…जागृत रहें ..,प्रबुद्ध रहें ..समर्पित रहें।
तभी आज़ादी का यह अमृत महोत्सव सार्थक सफल होगा। तभी हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकेंगे..।
किंतु आज़ादी के इस अमृत काल में एक और आवाज़ गूंज रही है। दबी सहमी सी एक करुण आवाज़..। वर्षों से अनसुनी सी एक आवाज़..सदियों से उपेक्षित आवाज़..। विभाजन के तांडव की आवाज़..।
हमारे स्वतंत्रता संग्राम की गाथा विभाजन की विभीषिका के ज़िक्र के बिना अधूरी है..। अहिंसा के उस महायज्ञ की परिणति रक्त की आहुति से हुई..।त्याग के उस अनंत तप की परिणति हिंसा की हुंकार के साथ हुई। हिंदू मुसलमान मैत्री एवं बंधुत्व की नींव पर खड़ा भारत नफ़रत और वैमनस्य की प्रचंड अग्नि में धू-धू कर जल उठा।।
सौहार्द एवं सहिष्णुता का भाव धार्मिक वैमनस्य की बलि चढ़ गया..। मानवता का प्रत्येक मानक शत्रुता के उस अंधड़ में विलीन हो गया..। एक दूसरे के रक्त से सरहदें खींची गयीं अमिट अचल सरहदें.., बँटवारा करती सरहदें.., हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच रात दिन पहरा देती सरहदें..।
कोई अपना कहीं जाता है ..,तो विदाई होती है..।विदाई का तिलक होता है..,विदाई की सौग़ात होती है..। सीने पर हाथ रख ‘ख़ुदाहाफ़िज़’के साथ सलामती की दुआ होती है..।
ये कैसी दारुण विदाई थी जो क्रोध में जलती आँखें दे रहीं थीं…,हाथों के ख़ंजर दे रहे थे…।
काश ये विदाई प्यार भरी होती..,कुछ सौग़ात ..,कुछ उपहारों से कही गयी होती..।फिर से मिलने का वायदा होती..,हिन्दुस्तान होता .,पाकिस्तान होता..,दोनो के बीच प्यार की ठण्डी बयार बहती..।दिल मिले रहते..,एक दूसरे के घर शादी-ब्याह में आने के वायदे रहते..,चिट्ठियों में दिल के अफ़साने होते..,’तुम्हारे बिना सब सूना है’…,ऐसे अल्फ़ाज़ होते…।
किंतु ऐसा कुछ भी ना हुआ।
अरसा हो गया है।सरहद आज भी वहीं खड़ी है। समय की राह रोक ..समय को बद्ध कर खड़ी है। नफ़रत की जाई सरहद..आग उगलती सरहद।
सुना है कुछ उदास है सरहद …। कुछ कहना चाहती है ..। लम्बी ख़ामोशी के बाद कोई अनकहा सा दर्द बयां करना चाहती है सरहद..। कँटीले तारों में जकड़ी शायद करवट लेना चाहती है सरहद..।
उम्र हो गयी है सरहद की
थक गयी है ..,आराम करना चाहती है..।
कुछ देर आँखों को मूंद..,सो जाना चाहती है..।
कोई मीठा सा गीत गुनगुनाना चाहती है,
गोलियों का शोर रोक
पंछियों का संगीत सुनना चाहती है..,
कँटीले तारों की क़तारों के बीच
कुछ फूल उगाना चाहती है..।
अपने रिसते हुए घावों पर
मंद पावन का मलहम लगाना चाहती है,
एक बार इस पार और उस पार को गले लगाना चाहती है..।
अतीत के भयानक विकृत चेहरे को
मुस्कुराहट देना चाहती है
एक नया अतीत बनाना चाहती है..।
अतीत जिसमें
एक बार फिर बँटवारे का दौर चले..,
पहले नफ़रत के ख़ंजर थे..,
इस बार प्यार की बयार चले..।
पहले दुश्मनी के फ़ासले थे..,
इस बार दोस्ती का हाथ बढ़े..।
पहले छूटते दयारे थे..,
अब मुलाक़ातों के दौर चलें..।
पहले टूटती साझेदारियाँ थीं..,
अब गले मिलती यारियाँ रहें..।
लेखनी के माथे पर शिकन न हो
कोई मुस्कुराती कहानी कहे..।
कविता उदास न हो..,
कोई गुदगुदाती दास्तान कहे..।
आंसुओं से भीगे मन पर
हंसी की फिर बौछार पड़े..।
दरिया का ख़ामोश किनारा
बुलबुल के गीतों से गुलज़ार रहे..।
थकी हारी सरहद को कुछ आराम मिले..,
नफ़रत का अंधेरा न हो
प्रेम और भाईचारे का उजाला रहे…।
By Rachana Mallick

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