आज तक
By Pallavi Pandit
इतनी नाराज़ थी मैं बीते हुए पल से,
कि झाँकने लगी अपने आने वाले कल में
कब से ढूँढ रही थी अपने खोए हुए वजूद को,
कह पड़ी, तुरंत समय के कटघरे में मौजूद हो
फिर अचानक, अनायास ही किसी मोड़ पर,
तलाशते हुए पाया कुछ धुँधला सा एक छोर पर
जिसे समझना नामुमकिन था, एक धूमिल सी छवि,
उसे पहचान न पाई मैं, मेरे भीतर का कवि
जो शब्दों से जूझता हुआ लिखने में लगा था,
न जाने कितनी सदियों से रातों को जगा था
जो उतारना चाहता था काग़ज़ पर अपना संसार,
उकेरना चाहता था कलम से जीवन को एक बार
उम्मीदों से ओतप्रोत मेरा अभिन्न प्रेरणा स्त्रोत,
जिसे शायद उजागर नहीं करना चाहती थी मैं
जिसमें बरसों बाद एक छ्टा मेरी दिखी,
जैसे पहली बार खुद से मिली थी मैं
दरअसल, रूठने का पहला हक़ तो उसका था,
जिसे मैने अपना जान मिलने की कोशिश तक ना की
आज तक ...
By Pallavi Pandit

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