आज का सच
By Aditya Jha
सारे रिश्ते नाते टूटे, कैसा आया शैलाब है,
कमल विहँसना भूला, अब कीचड़ सना तालाब है ।
प्रेम प्रीति हुई अंजानी ,
रक्त सम्बन्ध हुआ बेमानी ।
भ्रष्टाचार घुला जीवन में,
जैसे दूध घुला है पानी ।
हड्डियों के समाहार में, दिखता नहीं कबाब है ।
रक्तबीज बने हैं दुर्जन,
लहू पी करते हैं कीर्तन ।
खादी, खाकी, सफेदपोश मिल,
भलमानुष के करते भक्षण।
सुख शांति, देवत्व की चर्चा, लगता सुन्दर ख्वाब है ।
नित नारी की लुटती लाज
थाने में है गुंडाराज।
कपोतिनि के रक्षक आज,
बने हुए हैं हिंसक बाज।
नील शृगाल भोग रहा, शराब और शबाब है ।
सभी लोग मिल कर गाते थे,
चौपालों में राम रहीमा।
राजनीति घुसी खलिहानों में ,
बँट गए मंडल, मंदिर खेमा ।
संघर्ष करे अगड़ा पिछड़ा, जमाना बड़ा ख़राब है ।
अरे जाग, इंसान जाग,
क्यों रखा है दामन में आग ?
अनेकता की बात छोड़ ,
तज अपनी ढपली, अपना राग ।
चहुँ ओर कंटक है फिर भी, मुस्काता गुलाब है ....।
By Aditya Jha

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