आख़िर क्यूं
By Teri Kalam
“ पंच बिखादी एकु गरीबा राखहु राखनहारे ॥
खेदु करहि अरु बहुतु संतावहि आइओ सरनि तुहारे ॥ “
कुछ ना मिला तो रो दिए ,
थोड़ा कम मिला तो खो दिए ।
कुछ अपना ना भी होकर ,
आख़िर, क्यूं टूट गये थे उसे खोकर ?
कुछ सुना तो कुछ कहा हमने,
भूल दिया सब जहा हमने ।
क्या पल दो पल वो पाया था,
आख़िर, क्यूं समझ ना कुछ आया था ?
मालूम था जो आयेगा,
कुछ लायेगा कुछ लेजायेगा ।
वाक़िफ़ है हम उससे कहकर,
आख़िर, क्यूं चुप थे हम उसे सहकर ?
ऊँचे तो हम उठते गये,
कई ख़्वाबों संग जुड़ते गये ।
जीत जीत कर इस दुनिया को,
आख़िर, क्यूं हार दिये हम उस दुनिया को ?
ना रहा कुछ ना रह पायेगा,
ना रुका कुछ ना रुक पायेगा ।
अधूरा था अधूरा बचा है,
आख़िर, क्यूं ये सोच ख़फ़ा है ?
By Teri Kalam

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