आकृति
By Mona Mamtani
अरुणोदय की लाली जैसे,
अभ्युदय की चमक जैसे,
पंखड़ी पर शीतल ओस जैसे,
आप की है आकृति वैसे ।
घने बादलों को चीर कर जब बरसती है बूंदें,
सुगंधित हो उठती है मिट्टी जैसे,
दूज के चाँद से हो उम्मीद जैसे
है आपकी आकृति वैसे ।
बरगद के पेड़ की छाया जैसे
समुंदर की हो गहराई जैसे,
कभी न नापा जाए उस आकाश जैसे,
हाँ, है आपकी आकृति वैसे।
कमल की पावनता जैसे
जिसका अंत ना हो, उस क्षतिज जैसे,
मंदिर मे मिलती शान्ति जैसे
आपकी है आकृति वैसे।
बहने झरने की मधुर कलकलाहट जैसे
बासुरी की मिठास जैसे
अनगिनत तारो से सदा भरा रहे उस गगन जैसे
आपकी आकृति है हरदम समक्ष हमारे वैसे।
हरदम समक्ष हमारे वैसे।
By Mona Mamtani

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