अहंकार
By Dr. Suboohi Jafar
किसी भी व्यक्ति का अहंकार उसके मिट जाने तक ही जीवित है,
क्षण भंगुर है वह अभिमान, जिससे मनुष्य भ्रमित है,
चकाचौंध में डूबा है आज बुलंदी की ऊँचाई पर,
परंतु हर एक का पतन निश्चित है।
सूर्य कितना तेजस्वी होता है, परंतु प्रत्येक संध्या उसे अस्त होना पड़ता है,
सूर्यास्त के पश्चात चंद्रमा अपनी चाँदनी के साथ इठलाता है,
कदाचित, सूर्य के अस्त होने पर मंद-मंद मुस्कुरा रहा हो,
लेकिन सवेरा होते ही अपनी चाँदनी से हाथ धो बैठता है।
अहंकार तो केवल एक नीर के बुलबुले के समान है,
बुद्धिमान हैं वो, जिन्हें इस तथ्य का ज्ञान है,
जो इस मिथ्या के चक्रव्यूह में नहीं फंसते,
केवल उनका ही नाम सारे जग में विख्यात है।
लाल गुलाब, जो फूलों का राजा होता है, अत्यंत सुंदर होता है,
पहले कली, फिर फूल बन कर भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेरता है,
अपने आसपास के फूलों को देख, मन ही मन इठलाता है,
राजा हूँ मैं, यह सोच-सोच कर झूम उठता है।
परंतु उसे नहीं पता कि यह सुंदरता, यह जीवन क्षणिक है,
एक एक कर उस फूल की पंखुड़ियों का साथ छोड़ना निश्चित है,
फिर एक दिन झड़ जाएंगी सारी पंखुड़ियाँ, तरुवर भी साथ छोड़ देगा,
मिल जाएगा मिट्टी में अहंकार, क्योंकि अंत निश्चित है।
अहंकार एक रोग के समान है, जो क्षत विक्षत कर देता है,
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य बिगाड़ देता है,
काम, क्रोध और लोभ को साथ लेकर चलता है,
बुद्धि और विवेक, दोनों की ही हत्या कर देता है।
रावण अप्रतिम परिचायक है अहंकार से जुड़े विनाश का,
बल, बुद्धि, सेना, सब कुछ होते हुए भी, परास्त होने का,
शीर्ष पर अधिभोग हो गया था अहंकार का,
जो क्षणय-क्षणय कारण बना सर्वनाश का।
गर्व और अहंकार के मध्य अंतर समझना अति आवश्यक है,
कहाँ पूर्ण विराम लगाना है, यह जानना महत्त्वपूर्ण है,
जहाँ नहीं टिकी ज्ञानी महाज्ञानियों की प्रभामंडल,
उस संसार में अहंकार के साथ उत्तरजीविता असंभव है।
By Dr. Suboohi Jafar

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