अस्पताल
By Tushar Shekhar
आज फिर मै एक सुबह के इंतज़ार में हु,
लेटे लेटे घर जाने की आश के आसार में हु |
की जिंदगी गुजर गयी दुसरो की सुनने में,
जो सोचा था सिख लू कर लू वो अब रह जाएगी सपने में ||
एक तरफ जिधर खिड़की से बाहर जिंदगी दौर भाग रही थी,
वही दूसरी तरफ कई और जानें मेरे जैसी स्थिर परी थी |
मै सोच रहा था मंजिल की तलाश में संसार से इतना क्या बटोरना,
जब अनेक काफिरो को शुरू और अंत इसी जगह से करना ||
मेरी शक्ति से ज्यादा तो उस पेड़ की थी जिसे आराम से हवा टहलाती,
मै तो उठ भी नहीं सकता था जब तक नर्स ना आती |
ऐसा नहीं है जिंदगी हमे मौके नहीं देती, दिक्कत है हम भुना नहीं पाते,
काश जिंदगी भर अपनी इच्छा से जीते तो आज सुकून से जाते ||
स्वजन को निहारते आज कुछ बातें समझ आ ही गयी,
चाहे हज़ारो दोस्त क्यों ना बना लो वक़्त आने पे कुछ ही दिखते है भाई |
कुछ लोग ठीक होकर ऐसे जा रहे थे जैसे कोई जंग जित लिए हो,
मै भी सोचा यहाँ से निकलूंगा तो वही करूँगा जो मेरी हीत में हो ||
आखिर वो दिन आ ही गया जब मेरी भी छुट्टी कर दी गयी,
मैंने जाते जाते बेड को देखा वो ऐसे निहार रहा मनो उससे कोई रिस्ता हो बन आयी |
आज मै मुक्त हु उन दुःख भरे दिनों से और फिर से तिजोरी भरने में लगा हु,
शायद बाहर आते ही अपने से किये हर वादे को लगभग भूल चूका हु ||
By Tushar Shekhar

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