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अस्पताल

Nov 11, 2022
1 min read

By Tushar Shekhar


आज फिर मै एक सुबह के इंतज़ार में हु,

लेटे लेटे घर जाने की आश के आसार में हु |

की जिंदगी गुजर गयी दुसरो की सुनने में,

जो सोचा था सिख लू कर लू वो अब रह जाएगी सपने में ||


एक तरफ जिधर खिड़की से बाहर जिंदगी दौर भाग रही थी,

वही दूसरी तरफ कई और जानें मेरे जैसी स्थिर परी थी |

मै सोच रहा था मंजिल की तलाश में संसार से इतना क्या बटोरना,

जब अनेक काफिरो को शुरू और अंत इसी जगह से करना ||


मेरी शक्ति से ज्यादा तो उस पेड़ की थी जिसे आराम से हवा टहलाती,

मै तो उठ भी नहीं सकता था जब तक नर्स ना आती |

ऐसा नहीं है जिंदगी हमे मौके नहीं देती, दिक्कत है हम भुना नहीं पाते,

काश जिंदगी भर अपनी इच्छा से जीते तो आज सुकून से जाते ||





स्वजन को निहारते आज कुछ बातें समझ आ ही गयी,

चाहे हज़ारो दोस्त क्यों ना बना लो वक़्त आने पे कुछ ही दिखते है भाई |

कुछ लोग ठीक होकर ऐसे जा रहे थे जैसे कोई जंग जित लिए हो,

मै भी सोचा यहाँ से निकलूंगा तो वही करूँगा जो मेरी हीत में हो ||


आखिर वो दिन आ ही गया जब मेरी भी छुट्टी कर दी गयी,

मैंने जाते जाते बेड को देखा वो ऐसे निहार रहा मनो उससे कोई रिस्ता हो बन आयी |

आज मै मुक्त हु उन दुःख भरे दिनों से और फिर से तिजोरी भरने में लगा हु,

शायद बाहर आते ही अपने से किये हर वादे को लगभग भूल चूका हु ||


By Tushar Shekhar




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