अस्तित्व...
By Dr. Suboohi Jafar
अश्रु बहुत बहा लिए,
अब कुछ करने की बारी है,
असफलताओं से विचलित हुए बिना,
आगे बढ़ने की तैयारी है|
कितना भी प्रचण्ड हो सूरज का तेज,
कितने ही घने बादल हों, हों हवाएं तेज़,
थकना, रुकना, अब नहीं है संभव,
चहुँ ओर फैलाना है अब अपना वैभव|
चाहे मार्ग में सफ़लता मिले, या मिले असफ़लता,
यह तो भइया खेल है नियति का, इसे न कोई रोक सका,
रोक ले अब जिसे जैसे रोकना है, मेरा गंतव्य न बदलेगा,
अपने पथ पर चलना मेरा काम, जो अब हो कर रहेगा|
बहुत ही महीन लकीर है, अस्तित्व और घमण्ड के बीच,
पौधा हो प्रेम और तपस्या का, कठिन परिश्रम से सींच,
जो ठान लिया उसे हर हाल में पूरा करना है,
सारे जग में माता- पिता का नाम रौशन करना है|
है स्त्री तू, तू कहाँ कर पाएगी,
ऐसा कहने वालों की लम्बी क़तार लग जाएगी,
संस्कार सृजन का दायित्व है तुझ पर, यह कह कर पीछे खींचा जाएगा,
सदा शांत और पीछे रहना है, यही बतलाया जाएगा|
पर जिस प्रकार सूर्य की लालिमा बादलों से नहीं ढकती,
जिस प्रकार नदी, पर्वत और पहाड़ों से नहीं डरती,
उसी प्रकार, ओ स्त्री, तू भी बन वीरांगना,
बन जा निडर, कर सिंहनी सी गर्जना|
न हो विवश, कर विरोध तू,
तू अपने मन में ठान ले,
जो हासिल करने का स्वप्न बुना है,
उस सपने को साकार कर|
तोड़ दे रीतियों की बेड़ियाँ, वो व्यर्थ की कुरीतियाँ,
नदी के समान बह चलो, हर एक से यह कह चलो,
चलो, उठो, रुको न तुम, विरोध का करो दमन,
बुलन्दकरआवाज़को, तूजीतलेअबयेचमन|
By Dr. Suboohi Jafar

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