अर्धनारीश्वर
Updated: Dec 3, 2022
By Deepali Bhatia
मैं अपने से डरता हूँ!
पल पल मुखौटा धरता हूँ!
मैं कहूँ किससे?
मैं कहूँ कैसे?
मैं कहने से डरता हूँ।
मैं अलग हूँ,
तुम सब से,
इसीलिए शायद डरता हूँ।
मैं वही अभागा हूँ,
जिसे भाषा ने भी निम्न माना,
जिसे हरदम उपहास का पात्र पहचाना।
अपना सत्य जो कह दूँ तुम को,
तिरस्कार से सुसज्जित करते हो,
फिर कभी ना इज्जत देते हो।
खैर,
समाज से क्यों हो गिला मुझे,
जब अपनों ने ही त्यागा है।
जिसे कभी न सम्मान दिया,
न समान कभी माना है।
मुझे समाज का जो हिस्सा समझो,
मैं शिखंडी बन धर्मयुद्ध लड़ जाऊँगा,
मैं बृहन्नला-सा श्रेष्ठ कलाकर बन दिखलाऊँगा।
मुझमें ही पुरुष, मुझमें ही प्रकृति जो देखो तुम,
मुझमें ही शिव, और मुझ ही में शक्ति पाओगे,
अपने अंतर्मन के नेत्र खोल जब देखोगे,
मुझमें ही अर्धनारीश्वर का अंश जान पाओगे।
By Deepali Bhatia

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