अभिव्यक्ति
By Rimjhim Nigam
आज एक गाथा सुनाऊं मैं,
अपने जीवन के बारे में।
मैं सेवक हूँ भारत माँ का,
जल - जल कर उजियाला फैलाऊँ मैं।
शान से चलता निर्भय होकर,
अडिग हौसलों के साथ ।
जान ताक पर रखकर मैं,
शत्रुओं का अंत करता रक्तरंजित यह हाथ ।
मुझे नहीं है वासना,
जग के किसी सुख की।
मैं तो बस आराधना करूँ,
मेरी उस पावन जन्म भूमि की।
भारत माँ ने पूर्ण किया है हर स्वप्न,
अपने इस पूत का।
वो रक्त से अभिषेक हैं करती,
माटी के सपूत का ।
शनै: शनै: मैं लड़ता गया,
क्षीण किया शत्रु के इरादे को ।
अंधियारे का आवरण हटा,
प्रकाशित किया उजाले को ।
साँस रुक गई, शरीर शिथिल हुआ,
आँखे मंद-मंद बंद हुई ।
उस पूजनीय तिरंगे को,
लहराया हुआ देख चित्त फूला नहीं ।
By Rimjhim Nigam

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