अभिलाषा
By Mohan Jha
रुधिर रोम अणु- कण तन-मन में,
हिंदी के हर प्राण में हिंदी ।
मान और अभिमान भी हिंदी ,
भारत मां की शान ये हिंदी ।।
मातृ कोख से जन्मे हिंदी,
शिशु क्रंदन में पनपे हिंदी,
पुष्पित हो यौवन ऊर्जा से,
अंगड़ाई ले झूमे हिंदी ।
कुसुमित कानन में कुहके जो
कोयल की हर तान में हिंदी ।
मान और अभिमान भी हिंदी
भारत मां की शान ये हिंदी ।।
कृषकों के खेतों में हिंदी ,
सागर के रेतों में हिंदी
गूंजे वीरों की तोपों मे ,
हवन कुंड मंत्रो में हिंदी ।
हिमकर दिनकर के किरणों में,
धर्म -ज्ञान विज्ञान में हिंदी ।
मान और अभिमान भी हिंदी
भारत मां की शान ये हिंदी ।।
भरत- खंड भू- कण से उठकर,
उड़े गगन के पार भी हिंदी
सूक्ष्म शक्ति में दिव्य दृष्टि में,
सृष्टि प्रलय के पार भी हिंदी ।
जिए चलें सब हिंदी होकर ,
संग चले श्मशान ये हिंदी,
मान और अभिमान भी हिंदी,
भारत मां की शान ये हिंदी।।
By Mohan Jha

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