अभिमन्यु कहलाओगे
By Mohan Jha
धर्मक्षेत्र के मध्य खड़े हो;
चिन्तन मन्थन तुम्ही करोगे;
त्याग करोगे कुरूक्षेत्र का;
या फिर अन्तिम युद्ध लड़ोगे।
सुधा त्याग विष वरण करोगे, नीलकण्ठ बन जाओगे।
मरकर जब तुम जयी बनोगे, अभिमन्यु कहलाओगे।।
पाञ्चजन्य हुँकार उठा है;
समर सिन्धु में ज्वार उठा है;
यदि पलायन अब करते हो;
मृत्यु वरण से तुम डरते हो;
मातृ कोख भी लज्जित होगी;
सन्तति मान विसर्जित होगी;
लड़ो अन्यथा भीरु प्रलापी, कायर संज्ञा पाओगे।
मरकर जब तुम विजयी बनोगे, अभिमन्यु कहलाओगे।।
हवनकुण्ड प्रज्ज्वलित हुई है;
आहुति देते ही जाना है;
सोचो मरकर जीकर हमको;
क्या खोना है क्या पाना है;
अग्नि साक्ष्य है लोक लोक में, धवल मान यश पाओगे।
मरकर जब तुम जयी बनोगे, अभिमन्यु कहलाओगे।।
सावधान सबको करता हूँ;
दम्भ कदापि नहीं भरता हूँ;
आओ जिस जिस में साहस हो;
मरकर जीने की ताकत हो;
धरा सींचकर निज शोणित से, धर्मध्वजा फहराओगे।
मरकर जब तुम जयी बनोगे, अभिमन्यु कहलाओगे।।
By Mohan Jha

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