अब्बू जान !
By Karan Handa
ज़िन्दगी की जंग से
में अनजान रहता हूँ ,
बड़ी मजबूत है वो ढाल
में जिसके पीछे छिपा रहता हूँ
इंसान है शायद है भगवान वो
मैं तो अब्बू जान बुलाता हूँ !
रोटी से मकान तक; सुबह से शाम तक,
हर रोज़, हर पल, उसे खर्च किये जाता हूँ
यूँ कहने को नादान हूँ
वरना खुदा को मूर्ख बनाता हूँ
इंसान है शायद है भगवान वो
मैं तो अब्बू जान बुलाता हूँ !
जी लूँ में बेफिक्र, बेपरवाह लम्हे
ख्वाहिशे वो अपनी जिंदा दफनाता है
झूठ-मूठ छाती फुला जब वो मुस्कुराता है
सीने में उसके कब्रिस्तान नज़र आता है
भूख मुझे जब लगती है, सुख- चैन उसका खाता हूँ ,
इंसान है शायद है भगवान वो
मैं तो अब्बू जान बुलाता हूँ !
By Karan Handa

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