अब लिखा नहीं जाता इस वतन में..!
By Amit Vijay Jadhav
अब लिखा नहीं जाता इस वतन में...
क्युँकि हमवतनो से डर लगता है..,
उन्हें गर ना पसंद आयी मेरी बात तो मेरी लिखी कॉपी के साथ...,
कहीं मुझे ही न फाड़ दे !!
पच्छहत्तर साल की आज़ादी का जश्न तो मना लिया है हमने..
पर अब भी आज़ाद होना बाकी है,
आज़ादी को समझना बाकी है,
अपने माता पिता को उनसे कुछ गलत हुआ ये बताना...
उनके खिलाफ साजिश-ए -नफ़रत फैलाना नहीं होता..,
अभी तो हमें प्यार और नफ़रत में जो अंतर या फर्क है.. उसे समझना बाकी है!
ये लिखते वक़्त भी कई बार इसे मिटाने का खयाल आया है..,
पर फिर भी लिख रहा हूँ क्यूंकि इसके हर लफ्जो-अल्फाज के साथ..
मेरे ज़िंदा होने का भी खयाल आया है..,
अब तो इंतज़ार हैं उनका जो मुझे वतनपरस्त ना होने का खिताब दे देंगे..,
ये वही है जिनके हाथ कइयों के खून से सने है,
पर यही है जो असल में आज़ाद है..
क्यूंकि इनमे से कई नेता, मंत्री, अफसर, तालिब, कुछ सेवक
और कुछ तो आजकल अध्यापक बने हुए है!
यहीं है.. जो आज़ादी को सिखाते, बताते और जताते है,
और ना मानों तो गर्दन दबोच कर उसे झुकाते है,
यहीं है.. जो व्हॉट्सऍप स्टेटस पर..
बार बार जवानो के किस्से डालने को वतन परस्ती बताते है,
जवानों को सलाम तो हम भी करते है,
पर जो जवान हमें जोड़ता है...
पता नहीं हम उसी के नाम से देश को कैसे बिखेरते और तोड़ते है?
अब और लिखा नहीं जाता इस वतन में...
क्यूंकि हमवतनों से डर लगता है..,
यहाँ पर अपना तो कोई नहीं..
बस्स अब हर कोई गैर लगता है!
By Amit Vijay Jadhav

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