अब न हो
Updated: Jun 2, 2023
By Nidhi Chauhan
कोई ऐसा दिन न आए कि वो सलामत न हों;
दिलो दिमाग से हो जाएँ वो रिहा इस क़दर, के अब हमें उनसे कोई शिका़यत न हो;
अब दोबारा किसी के खा़तिर, दिल की हमसे बगा़वत न हो;
दुआओं में हिफा़ज़त की चाहत रखते हैं वो, मगर उनकी दुआओं से हमारी हिफा़ज़त न हो;
भूल कर भी अब उनकी हम पर इनायत न हो;
जो पलट कर लौट भी आएँ वो, तो अब कभी हमें उनकी चाहत न हो;
जिन गलियों में हों उनके एहसास की खु़शबू, वहाँ जाने की कभी हमारी हिमाक़त न हो;
दिल के तख़्त पर बैठाकर बेवजह उतारे कोई, अब ऐसी कोई सियासत न हो;
मोहब्बत देकर बेवफा़ई कमाई, अब ऐसी कभी तिजारत न हो;
न मिलने की चाहत न देखने की हसरत, दस्तक़ दे दे मौत मगर, मेरी चौखट पर उनकी आहट न हो;
ख़र्च हो मोहब्बत के नाम पर एक भी अश्क़, लफ्ज़, जज़्बात कभी, कभी हमारी ओर से हमें इतनी रियायत न हो।
By Nidhi Chauhan

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