अब तो आ जाओ कि ज़िंदगी कम है
By Umar Allahabadi
अब तो आ जाओ कि ज़िन्दगी कम है,
दिल ये रोता है, आंखें पुर - नम हैं,
कतरा कतरा पिघल रहा हूं तेरी याद में,
सांसो का चलना भी तो एक सितम है,
बोझ है मुझपे ये सांसें, दिल का धड़कना भी,
खफा है मौत भी और ज़िन्दगी बे - रहम है,
अधूरेपन का एहसास है हर लम्हे में,
ये एहसास हर एक लम्हा पुर - गम है,
हिज्र में बीते हुए दिन रूह पर हैं ज़ख्मों की तरह,
विसाल ए यार ही ईलाज है, इसका मरहम है,
अब तो आ जाओ कि ज़िन्दगी कम है।
By Umar Allahabadi

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