“अब जी लेने को जी करता है”
By Deepankar Bhardwaj
अकुलाते चंचल जीवन में,
स्थिरता मद पीने को जी करता है।
व्यर्थ व्यथा बहुतेरे झेले,
अब जी लेने को जी करता है।I
जब मनुज रूप में निज को पाया,
मन तो फूला नहीं समाया।
किंतु जब से होश सम्भाला,
एक भी क्षण को चैन न पाया।I
शांति चाही, संताप मिला,
अब इसी ताप वरण को जी करता है।
व्यर्थ व्यथा बहुतेरे झेले,
अब जी लेने को जी करता है।I
जब से श्रम को सर्वोत्तम पाया,
पूरा मन फिर यहीं लगाया।
संघर्ष बना श्रम कैसे किंतु?
भोला मन यह समझ न पाया।I
संघर्ष किए चित का मन भी अब,
कुछ रुक सोने को ही करता है।
व्यर्थ व्यथा बहुतेरे झेले,
अब जी लेने को जी करता है।I
निज मन को लोभ आनंद बताया,
नित पाने को नए ग्रास बनाया।
किंतु अंत नहीं इसका तब जाना,
जब कुछ ही क्षण जीवन के बचते पाया।I
जीवन पाकर ना जीने की पीडा,
अब सी लेने को जी करता है।
व्यर्थ व्यथा बहुतेरे झेले,
अब जी लेने को जी करता है।I
By Deepankar Bhardwaj

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