अपने सपने बेच आया
By Mohit Kumar
किसी रोज़ जरूरत आ पडी पैंसो कि,
कुछ कर्ज़ चुक्ता करना था बरसो का,
मंसा नही थी पर मजबूर था मैं उस पल,
तो कर आया मैं सौदा अपने सपनो का।।
मुश्किल था, अपने सपने को पराया होता देखना,
मुश्किल था, दूर जाते देखना जिसे मैने पाला था,
बुना था एक एक पल जिसे मैंने अपने मन मे,
खैर, किसी को तो खुशी दे दूंगा ये कर के।।
अब क्या रखा है, रोज़ हज़ारो सपने बिकते हैं बीच बाजार,
बोलियाँ लगनी बंद नही होतीं हैं, ना बाजार बदलता है,
क्या मोल सोचा था मैने? नहीं, पर मोल होता है हर सपने का,
कितना भी बाजार टटोल लो पर एक अलग एहसास होता है अपने का।।
By Mohit Kumar

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