अपना शहर
By Manivarna Nair
हर शाम की तरह आज बैठीं हूँ मैं चाय की टपरी पर उसे मिलने,
हर शाम की तरह आज भी दो कटिंग ही मंगवाया मैंने,
चाय की लत बचपन से उसी ने लगवायी थी,
अब हाल ये है की उसके बिना चाय ही फीकी लगती थी,
तो कल के बाद क्या होगा, पूछना चाहा दिल ने,
सोचते ही खुली नल की तरह आँसू टपकने लगी आँखों से,
आधी ज़िंदगी बिताई थी मैंने इन गलियों में रहकर,
कल जाना था इसी शहर को दूर छोड़कर,
आज मिलना था एक आखिरी बार उस बंदर से,
जिसके साथ रहकर दोस्ती क्या है, यह पढ़ा मैंने,
इन खयालों के बीच मैं देख नहीं पाई उसको,
कब आकर मेरे पास बेंच पर बैठ गई वो,
उसपर नज़र पड़ी तो देखा कि आँख सूझी और लाल बन पड़ी थी,
जैसे शाम को ढलता सूरज धरती से दूर जाने पर रो रही थी,
कुछ वक्त तक हाथ में प्याली लिए हम दोनों बैठे रहें,
चायवाले की दूकान में बजते गाने कानों में गूंजते रहे,
फिर अचानक से एक हलकी मुस्कान देकर वह मेरी तरह देखी,
अरे यहीं बैठे रहे तो मच्छरों की आज दावत पक्की होगी,
चलो यह शाम को ऐसे चाय पीते पीते गुज़रना नहीं है,
शहर की एक चक्कर तेरे स्कूटर पर लेके आते हैं,
तो चढ़े दोनों स्कूटर पर और निकली हमारी सवारी,
एक आखिरी बार इस शहर के कोने को देखने की कोशिश थी मेरी,
स्कूल के सामने हमलोग आकर खडे हुए,
और कुछ समय उस इमारत को देखते रहे,
बारहवीं के बाद लगता था स्कूल से जाना ही दुनिया का सबसे मुशकिल काम होगा,
पर क्या पता था एक दिन इस शहर से अनजान होना पड़ेगा,
स्कूल के पास एक चाटवाले भैया थे हमारे,
जिनकी चाट के चर्चे थे हर कोने में,
दुकान की तरफ नज़र पड़ी तो रहा ना गया हमसे,
दौडे़ हमउनके हाथ के बने पुचके खाने,
उस एक चीज़ ने मानो यादों की तिजोरी सी खोल दी,
चौदह सालों में बिताई ज़िदगी एक झलक में दिख गई,
आज पूरी शाम हम दोनों ने स्कूटर पर ही बिताया,
निकली थी अपना कुछ वक्त बिताने पर फिर एक बार शहर से पहचान हुआ,
वापस लौटते वक्त पार्क की एक बेंच पर बैठ गये,
और सामने की सड़क पर आँख टिकाये बैठे रहे,
कुछ देर बाद वह बोली की वहाँ जाकर याद न करना मुझे दिनभर,
गला भर आया तो फिर टिका दी नज़र सड़क पर,
कुछ और इधर उधर की बातें हुई बीच हमारे,
फिर वह घड़ी आ गई जब घर लौटना था हमें,
छोटी आवाज़ में उसने पूछा क्या रहेगी यह दोस्ती पुरानी जैसी,
तब लगा एक पल को कि झूठी आस देनी क्या सही थी,
पर इतना ही बोल पाई मैं,
आज के बाद हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे रहने और जीने के,
अब उतना मिलना भी ना होगा तुमसे,
मिलेंगे कोई दोस्त जिसके सहारे फिर एक बार जिएंगे,
पर इसका यह मतलब नहीं कि भूल जाएंगे तुम्हें,
बस इतना ही है कि तुम्हारी जगह दिल में खाली रहेगी,
वह जगह किसी के भरने के लिए नहीं होगी,
पर आगे बढ़ने के लिए उस खालिपन को अपनाकर चलना होगा,
शायद एक दूसरे के उतने करीब न रहे यह मान लेना होगा,
बस एक चीज़ ही रह गयी है बताने के लिए,
कि चाहे हम ज़िंदगी में कितने ही उलझ जाए,
ऐसी दोस्ती रखने की कोशिश करेंगे तुम्हारे साथ,
कि बरसों बाद दुनिया के किसी कोने में जब हो जाए मुलाकात,
बातें वहीं से शुरू हो जहाँ खत्म हुई थी ,
सालों की दूरी के बाद भी बिना झिजक सब बातें कह पाऊँगी,
बस यहीं कोशिश करेंगे कि एक दूसरे से अनजान न बने,
ताकि फिर मिले तो एक दूसरे को पहचान सके।
आज निकल गयी हूँ मैं उस शहर की पकड़ को छोड़कर ,
अपने दिल के कोने में उन यादों का एक टुकड़ा भरकर,
अगली बार की मुलाकात तक रखूँगी उसको दिल में,
फिर निकल पडूँगी उस पुरानी शहर से फिर एक बार मुलाकात करने।
By Manivarna Nair

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