अपना अपना हिस्सा
By Aditya Jha
सरकार ने बनायीं योजना
जन जन को साक्षर करने हेतु ।
कभी चरवाहा विद्यालय
कभी सर्वशिक्षा अभियान
कभी वयस्क शिक्षा योजना
सांध्य विद्यालय ,ब्लैक बोर्ड अभियान !
कभी दो पहर भोजन योजना ।
लेकिन समाज के प्रत्येक एकक में
लगी घुन भ्रष्टाचार की l
शीर्ष से चला रूपये का सिक्का
गुजरता मंत्रियों, नौकरशाह द्वारा ,
निकलता प्रबंधक, ठेकेदार,प्रधानाचार्य
की जेब से
दस पैसे सिक्के के अवतार में
अंतिम सदुपयोग के लिए !
टुकड़ा हिम खंड का
गुजरता कई हाथों से .
रह जाता जल की कुछ बूँदें ,
अंतिम हाथ में ।
स्कूल में दोपहर भोजन के लिए ,
संपूर्ण बजट के दशमें भाग से ,
रचते हैं नैवेद्य लगाने का स्वांग ।
सड़े गले अनाज, अंडे, दूध से
कल के नागरिकों के लिए,
जिनके वृषभ कन्धों पर है लिखनी
नए भारत की जय कथा ।
पर दुखद परिणति होती है,
`मिड डे मील 'खाकर,बच्चे बीमार ।
पर इससे बेपरवाह, प्रधान जी, आचार्य जी ,
रहते हैं सतत दुखी
नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या ?
`कहाँ से जुगाड़ करें अपना हिस्सा ?'
अब की तो स्कूल भवन की फण्ड से
चल गया काम
बन गयी अपनी एवं मुखिया जी की कोठरी ।
भले स्कूल की चहारदीवारी
बनी कागजों पर
और गिर पड़ी ।
बच्चे कागज के तो हैं नहीं ,
झेल लेंगे टूटती छत से आती
पावस की बूंदों को चातुर्मास में ,
टाट पर बैठकर ।
आने वाली है मुफ़्त वितरण के लिए
उपस्करों, पुस्तकों की नई खेप ।
उनकी आँखें चमक जाती हैं ,
धूसर, मटमैले, बदरंग
मुंह चिढ़ाते श्यामपट्ट देखकर ।
जिस पर दौड़ रही होती है
पीली सी छिपकली ,
लगाती हुई भोग, कीट, पतंग का !
By Aditya Jha

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