अन्धकार में डूबा (A Poem On Depression)
By Bhavya Chhabra
एक कोना ऐसा
जहाँ कोई नहीं आता जाता
न तो बाहर के शोर की आवाज़ है अंदर आती
और न इस कोने से आती चीख चिल्लाहट की आवाज़ों को कोई सुन पाता
अन्धकार में डूबा
उजाले को निघल ले यह
शायद खुद ही रोशन नही होना चाहता
चल रही हैं सांसें
यह एहसास करवाता
छाती पर बैठ घोटे गला
जैसे क़त्ल हो करना चाहता
कभी खुद से दोस्ती
कभी खुद ही से बैर
उस कोने में है बैठा वो कौन
जो वहां से निकलना ही नही चाहता
By Bhavya Chhabra

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