अनकही ख्वाहिशें
By Sonal Mathur
मैने अपनी ख्वाहिशों को मन में दबाए रखा,
गहराइयों में इनको अपने तक समाए रखा।
कई बार निकलने लगे अरमान दरारों से,
झट से झटक्कर हमने इन्हें दबाए रखा।
क्या करते जो खुल जाते चाहतों के धागे,
हमने इसे कई बार उलझाए रखा।
मैने अपनी ख्वाहिशों को मन में दबाए रखा।।
टुकड़ों पे जीना सीख लिया है अब हमनें ,
हंसकर झूठ बोलना सीख लिया है अब हमनें ।
यह कला सीखने में ज़माने लग गए,
हम फिर अपने अल्फाज़ दबाने लग गए।
करते भी क्या ज़ाया, यहां कौन समझेगा,
औरत की बात क्या ज़माना अब सुन लेगा?
चाहत ही है जो मन सपने आज भी बुनता,
हसरतों के बाघ में कलियों को फिर है चुनता।
उठता है कदम, डरके उड़ानों को दबाए रखा,
मैंने अपनी ख्वाहिशों को मन में दबाए रखा।।
यूं तो अक्सर मैं चहक लिया करती हूँ,
फुरसतों के पल यूं ही जी लिया करती हूँ।
चोरी से चुपके से कुछ कर लेती हूँ अरमान पूरे,
बना लेती हूँ सपनों को जो रह गए अधूरे।
इस तरह से अक्सर जीवन जी लेती हूँ मैं,
कभी अकेले तो कभी ख़्वाब देख लेती हूँ मै।
नहीं कोई भी गिला जो मिला सजोके रखा,
मैने अपनी ख्वाहिशों को मन में दबाए रखा।।
By Sonal Mathur

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