अधुरी दुआ
By Dr. Shubham Hiremath
तेरा सिर झुके जिसके सामने ऐसा 'खुदा' बनने से अच्छा
ताउम्र तेरी अधूरी ' दुआ 'भी तो ठीक मैं।
किसी की भी नहीं ऐसी जलनेवाली भीड़ के
'हुकुम राणा' से अच्छा अकेलेपण का 'गुलाम' ही ठीक मैं।
कभी सर पर तो कभी 'कब्र' पर सजनेवाली खूबसूरती से
अच्छा बदशक्ल 'खार' ही ठीक मैं।
जलकर भी उंगलियां उठती सितारों की रोशनाई से अच्छी
गुमनाम अमावस की रात हि ठीक मैं।
तुझे जितने की चाहत में बरबाद होने से अच्छा
सुकून से 'हारा' भी तो ठीक मैं।
By Dr. Shubham Hiremath

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