अद्भुत रचना
By Sanjnna Girdhar
दो चंचल नयनों में शोखी,
मयखाने में जाम धरा ज्यों!
और कोई मदिरा का प्यासा,
मस्त शराबी देख रहा हो!!
मुझे दीवाना काहे बनाती!
तुम अद्भुत रचना हो साथी!!
उदयाचल रवि के प्रकाश सा,
कान्तिमान यह रूप तुम्हारा!
नहीं धरा की कोई मानवी,
देव लोक की कोई अप्सरा!!
वाणी ज्यों संगीत सुनाती!
तुम अद्भुत रचना हो साथी!!
बाहें हैं या अमरबेल ये,
प्रियतम का गलहार बनी हैं!
अर्थ भरी मुस्कान तुम्हारी,
कैसा अद्भुत प्यार बनी हैं!!
दूर खड़ी मुझको तरसाती!
तुम अद्भुत रचना हो साथी!!
ऐसा है सौंदर्य तुम्हारा,
काम देव का भी मन डोले!
रूप सुंदरी, मृगनयनी तू,
कामुक, तृषित, नयन जब खोले!!
नयन मिला क्यों हृदय चुराती!
तुम अद्भुत रचना हो साथी!!
श्वेत संगमरमर सी मूरत,
किस रचनाकार की तुम रचना!
अद्भुत रूप सौंप कर किसने,
दिखलाया है कौशल अपना!!
एक पहेली तुम कहलाती!
तुम अद्भुत रचना हो साथी!!
कैसा यह उपहार दिया है,
हे प्रभु! तेरी लीला न्यारी!
ऐसा जीवन साथी पाकर,
आलोकित हुई दुनिया सारी!!
By Sanjnna Girdhar

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