अदा-ए-मुहब्बत
By Ishita Bhargava
तेरी नजरों से देखूं जो खुद को
आईने की जरूरत बेमानी लगे है।
सलीका ए मुहब्बत का रहूं मुरीद तो
ताज की रंगत पुरानी लगे है।
यादों में रखूं बसाकर जो हर दम
तेरा चेहरा फकत नूरानी लगे है।
मुहब्बत है हमें उनसे, तो क्या है खास
तमाम दुनिया ही उनकी दीवानी लगे है।
मेरे अमाल में जाहिर हैं उनकी ही सिफात
हर फेल मेरा सबको पुररूमानी लगे है।
सिम्ते मस्कन लौट तो पड़े हैं लेकिन
बेखुदी में हर सूरत मुझे बेगानी लगे है।
तेरा नशा आबे जमजम से क्या कम होगा
रब में तू, तुझ में रब, अब मुझे लासानी लगे है।
By Ishita Bhargava

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