अतुलनीय भारत
By Nikhil
आसमान आज ही की तरह नीला था, पर सब कुछ लाल नज़र आरहा था।
मुझे अच्छे से याद है की मेरी सलवार का रंग तो पीला था।
मगर नजाने ही क्यों वह गीला और लाल दिख रहा था।
घर जल्दी आने का वायदा करके आयी थी।
पिंकी का पोस्टर बनवाना था, मम्मी को बाजार लेकर जाना था..
अरे पापा की शाम की चाय का वक़्त भी होता ही होगा
पर जैसे की कोई शरीर का हिस्सा मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।
भीड़ ने चारो और से घेरा हुआ है पर आंख मिलाने से हर कोई कतरा रहा है।
अरे आपको शायद ये जानकारी नहीं क्युकि आप तो केवल मेरे शब्दों के भरोसे मुझे देख रहे है, पर पर मैं भी ना
बस अभी ध्यान गया की मेरी सलवार तोह फट चकी है, नजाने कैसे मगर वहा वहा बहुत दर्द हो रहा है।
उठ सकती तो ज़रूर देख कर, लोगो से पूछ कर बताती की बताती की बात क्या है।
कभी किसी का एहसान लेना पसंद नहीं किआ मगर इस बार लेलूँगी,
बस कोई अगर मुझे मेरे पेरो पर खड़ा करदे बस तब मैं समय से घर पोहोच जाउंगी।
माँ डाँटेगी नहीं , पापा गुस्सा नहीं होंगे और मैं… मै फिर कभी घर से नहीं निकलूंगी।
By Nikhil

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