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अटैची

Nov 26, 2022
2 min read

By Vidhi Kotak


थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


अभी तो ठीक से थामा भी नहीं,

तेरे नन्हे हाथों को;

अभी तो सुर जमा भी नहीं,

लोरियों में रातों को-

तेरी हर पल बदलती अदाओं में,

दरिया भर पिघल रही हूँ;

तेरे नैनों के भोले भंवर में

झूम-झूमकर ढल रही हूँ.


थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


आज तेरी नज़रें ढूंढें हैं सिर्फ मुझे-

कल लुभएंगें यार- त्योहार तुझे;

कभी यह सोचकर सहम जाती हूँ,

फिर खुद को- कुछ तो- समझाती हूँ.

कितना मोह- बहुत मोह होता है?

हिसाब-किताब कर ही नहीं पाती हूँ.





थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


अभी तो जी भरके तेरा

सर थपथपाया भी नहीं;

अभी तो तेरी चहकती हंसी पर

पूरा प्यार आया भी नहीं;

क्यों दौड़े जा रहा है तू समय-संग,

अभी तो नई हरकतों को तेरी

मन में दोहराया भी नहीं.


थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


अभी तो तुझे बिन डरे

ठीक से उठाया भी नहीं,

बेकरार बाहों में-

ज़ोर से झुलाया भी नहीं.

अभी तो सीने के कई कोनें बाकी हैं

जिनपर तुझे इत्मीनान से,

मैंने सुलाया भी नहीं.

खुदगर्ज़ी की सारी हदें,

पार कर रही हूँ;

'ललचाएगा कभी तो' सोचकर,

समय की जेबें भर रही हूँ.


थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


कितने पलों को इकट्ठा करूँ?

किन क्षणों को छोड़ू- पिरोऊँ?

तस्वीरों के पिंजरों में ही सही,

वक्त को वश में कर रही हूँ.

शुक्र है दिल के गुल्लक

असीमित होते हैं,

मिटटी वाले तो तेरी यादों से-

रोज़ नए उमड़ रही हूँ.


थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;

ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.


By Vidhi Kotak





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