अटैची
By Vidhi Kotak
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
अभी तो ठीक से थामा भी नहीं,
तेरे नन्हे हाथों को;
अभी तो सुर जमा भी नहीं,
लोरियों में रातों को-
तेरी हर पल बदलती अदाओं में,
दरिया भर पिघल रही हूँ;
तेरे नैनों के भोले भंवर में
झूम-झूमकर ढल रही हूँ.
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
आज तेरी नज़रें ढूंढें हैं सिर्फ मुझे-
कल लुभएंगें यार- त्योहार तुझे;
कभी यह सोचकर सहम जाती हूँ,
फिर खुद को- कुछ तो- समझाती हूँ.
कितना मोह- बहुत मोह होता है?
हिसाब-किताब कर ही नहीं पाती हूँ.
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
अभी तो जी भरके तेरा
सर थपथपाया भी नहीं;
अभी तो तेरी चहकती हंसी पर
पूरा प्यार आया भी नहीं;
क्यों दौड़े जा रहा है तू समय-संग,
अभी तो नई हरकतों को तेरी
मन में दोहराया भी नहीं.
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
अभी तो तुझे बिन डरे
ठीक से उठाया भी नहीं,
बेकरार बाहों में-
ज़ोर से झुलाया भी नहीं.
अभी तो सीने के कई कोनें बाकी हैं
जिनपर तुझे इत्मीनान से,
मैंने सुलाया भी नहीं.
खुदगर्ज़ी की सारी हदें,
पार कर रही हूँ;
'ललचाएगा कभी तो' सोचकर,
समय की जेबें भर रही हूँ.
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
कितने पलों को इकट्ठा करूँ?
किन क्षणों को छोड़ू- पिरोऊँ?
तस्वीरों के पिंजरों में ही सही,
वक्त को वश में कर रही हूँ.
शुक्र है दिल के गुल्लक
असीमित होते हैं,
मिटटी वाले तो तेरी यादों से-
रोज़ नए उमड़ रही हूँ.
थोड़ा सा तेरा बचपन, अटैची में भर रही हूँ;
ज़िद्दी वक़्त से आज फिर, खामखा लड़ रही हूँ.
By Vidhi Kotak

Comments