अटल-भ्रम
By Dineshkumar Hirani
“अटल-भ्रम“
नारी निकली तूँ तो सबड़ी,
बहुत पीछे तेरी सेना मेरी लबड़ी,
कारण तेरे आज खुर्शी मेरी गबड़ी,
है साथ तेरे माया-ममता और रबड़ी,
थका दीया तूने मुजे खेल के साथ कबबड़ी,
तेरह महीने में की थी तबीयत तगड़ी,
दिन तेरह में कर दिया तूने सुखी लकड़ी,
इतना होने के बाद भी आँख मेरी ना फफड़ी,
पछताता हूँ आज था मौका तब तुजे क्यूँ ना पकड़ी,
होगा कारण तो वही स्त्री विरुद्ध की मेरी अकड़ी,
अब तो भला हो उसका जो ले जाए हाथ मेरा पकड़ीI
By Dineshkumar Hirani

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