अच्छे दिन की ओर..
By Vinayak Pratap Singh
नीयत अब इंसान में रही नहीं दौलत से इतना प्यार भी सही नहीं कि अपने ही अपनों की आंखों में चुभने लगें ऐब ही ऐब हर दूसरे में ढूँढने लगें
समय वह भी एक होता था इंसान को इंसानियत में ही सुख होता था पर आधुनिक बनने की इस होड़ में छोड़ गए हम वो प्यार गाँव की चकरोड पे
वो बड़े परिवार की जिम्मेदारियां वो दादी माँ की अतरंगी कहानियाँ कहाँ मिलेंगी इन तंग कमरों में वो खुले आंगन की खुशहालियां
फर्क शहर या गाँव का है ही नहीं सोच हमारी सच्ची कहीं भी नहीं खुद से ही ये सवाल करो कितनी सच्चाई मुझमें बची रही
पर आशा आज भी रखता हूं इंसानियत का दिया रोज जलाता हूँ एक दिन हम जरूर सबक लेंगे स्वार्थ की आंधियों से दिए को ढक लेंगे
By Vinayak Pratap Singh

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