अच्छुत प्यार!
By Amit Vijay Jadhav
मैंने अपने प्यार से उसके दिल को छूने की कोशिश की..,
पर वह मेरे प्यार से दूर भागने लगी..
और मेरा प्यार.. अनछुआ ही रह गया,
मेरी तरह अच्छुत बनकर!
लगा था इसबार तो कोई छू लेगा.. अपना समझकर,
बाहों में भर लेगा..और सदियों से जी रहा अनछुआपन मिटा देगा,
उसने अपना तो समझा..तो भी अंजान बनकर,
और इसबार भी ये अनछुआ.., बंधुआ.. बंधा हुआ ही रह गया..,
प्यार समझाने में.., समझने में.. सदियों की तरह..
मैं फिर से लेट हो गया!
गलती उसकी नहीं थी.. मेरी थी,
हर वक़्त गलत जगह,
गलत वक़्त पर मौजूद रहना आदत सी हो गयी है..,
पैदा होने से पहले..शायद..
गलत कोक में मौजूद था,
बड़े होते..होते.. गलत घर में पल रहा,
गलत लोगो संग..,
जिनकी परछाई भी.. लोगो को डराती रही,
गलत रिश्तों में गलत रिश्तेदारों के बिच मौजूद था !
उनकी भी कोई गलती नहीं थी,
उनके पीछे तो सदियों से बढ़ता हुआ..
पता नहीं सही कहुँ या गलत?
पर इक सनातन.., करुणा से भरा..
इतिहास मौजूद था !
हर जगह लेट था..,
या बहोत से लोग मुझसे पहले.. हर जगह मौजूद थे,
मैं तो जनम से ही.. हर बार पीछे रह गया,
आगे रहने वाले कैसे होते है? क्यों होते है?
पता भी नही..,
पर मैं उनके लिए भगवन का बच्चा बनकर रहा.. (हरिजन),
अच्छुत था.. भगवान ही की तरह..,
उसीकी तरह अनछुआ ही रह गया,
अच्छुत ही रह गया !
उसने मेहेरबानी दिखाकर साथ दिया था..,
मैंने प्यार समझ लिया..,
लगा..अब अनछुआपन स्वाहा: हो जाएगा..,
पर गलतफहमी मिटने के बाद..
मेरी जगह फिर पता चली..,
कई रेत के दर्या दौड़ आया हूँ..,
कई सदियाँ.. पीछे छोड़..,
पर अच्छुतपन के एसिड अटैक का ज़ख्म..
आज फिर ज़िंदा होकर जल गया,
अनछुआ था..,अच्छुत था..,
और अच्छुत ही रह गया !!
By Amit Vijay Jadhav

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