अच्छा है
By Manish Upreti
सारे अरमानों को पावों तले दबाकर दुनिया से पलभर में बेखबर हो जाओ तो अच्छा है
उन्हें समझाने से क्या जो अब तक नहीं समझे सड़क पर बैठे अजनबी को हाल सुनाओ तो अच्छा है
तुम्हारी तकलीफ में रात भर जागी रही जो मां इक पल तुम भी उसके लिए जग पाओ तो अच्छा है
सलाह यह है कि दुनिया के हर रंग से वाकिफ हैं हम इन रंगों में कभी बदरंग भी हो जाओ तो अच्छा है
ये क्या? डर के कैसे कांपने लगे हो
बैठकर कभी डर के सामने डर को भी डाओ तो अच्छा है
अगर ये दुनिया पसंद है तुम्हें
कभी हमारा हाल सुन पाओ तो अच्छा है
क्यों सुनाते रहते हो बदनीसीबी के किस्से
कलम के खून से कभी कागज़ पर उतारो तो अच्छा है
बस साँसों में अटक जाते हैं सपने मेरे
जो कर ना पाए बस वही कर पाओ तो अच्छा है
सजते रहते हैं वो घूंघट में बस किसी एक के लिए तुम उनके ख्वाब सजाओ तो अच्छा है
भूखा ही रहता है पैसों का ये इंसान
तुम गरमाती धूप में किसी की प्यास बुझाओ तो अच्छा है
उठो सपनों के राजकुमार सूरज निकल आया है कभी जमीं की धूल भी खाओ तो अच्छा है
उकता कर सभी से दूर जाकर क्या करोगे
कभी पुराने यारों को घर पे बुलाओ तो अच्छा है
By Manish Upreti

Comments