अग्नि
By Shashank Kumar Sinha
दिशाहीन हूं मैं
हरेक तन में विलीन हूँ मैं
कोई आह नहीं
कोई चाह नहीं
अग्नि का शरीर हूं मैं |
मैं दौड़ता हूं रक्त-सा
मैं फैलता हूं सस्त्र-सा
हर कण के करीब हूं मैं |
मेरा पहुंच है ब्रह्मांड में
मेरा शुरुआत है आसमान में
त्रिनेत्र का नीर हूं मैं |
मुझे छु ना पाते हो
मुझे पाकर मोक्ष को जाते हो
समय भी वहाँ इतिहास दौड़ाती
जहां गरज में जाता हूँ
प्रलय को बना वीर हूं मैं |
वरुण भी थर्राता है
जहां बिजली सा कौंध जाता हूँ
हर नजर झिलमिला जाती है
जब अपनी रश्मि को फैलाता हूं |
मेरा नाम सुनकर असुर डर जाते है
मुझे पाकर सुर भी गौरव को पाते है
कभी रक्त से सणा गांडीव बना
कभी जन्मों के बंधन का साक्ष्य बना
धर्मकोसमर्पिततीरहूंमैं ||
By Shashank Kumar Sinha

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