अक्षय वृक्ष
By Mona Mamtani
वो जो बरगद का विशाल वृक्ष है ,
प्रकृति उर्वर जिसकी।
घने गठीले कायवाला ,भव्य आलौकिक अक्षय वट कहलाता
वो प्राचीन बरगद , श्रुत और घना ,
दिलाता हमको याद आपकी है ' बाबा '|
ब्रह्मा , विष्णु , महेश जिसमे विराजमान हो ,
उस वट वृक्ष की तरह आप हम में सदैव समाये हो।
अपनी जड़ों से जुड़े रहे हैं सदा हम ,
आपकी कोशिश का ही तो परिणाम हैं हम।
शाखाओं की तरह फैलो और शीतलता बिखेरते रहो ,
सीख दी आपने हमें ;कहा -
उड़ान भरो इस तरह से , मेहनत का हाथ थाम लो ,
सत्य हो जाये सपने ;जो देखें खुली आँखों से हों।
पावन हो विचार तो पा जाओगे असाधरण को भी।
निष्कर्ष आता नहीं आसानी से कभी-।
दृढ़ रहो अपने पथ पर उस वट की तरह ,
जो प्राचीनतम से मुस्कुरा रहा है -धूप और बारिश मे भी।
हर सृजन ,हर वर्ग के बने रहो तुम मित्र सदा ,
प्यार बाटो विश्वास की डोर से ऐसा ,
जीवन मे सक्रीय रहे हर रिश्ता जैसा।
आपके आदर्शो पर चलने की कोशिश है सदा ,
रखकर आपका स्नेह हृदय में सदा ,
यादों में साथ हो आप हमारे ,
महसूस करते है आपको अपने पास सदा ,
हाँ बाबा , महसूस करते है आपको अपने पास सदा।
By Mona Mamtani

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