अंश (Ansh)
By Mona Mamtani
एक अंश सी मैं आई थी,
तुझमे ही समायी थी।
सींचा संजोया तूने मुझे,
तभी तो मैं मस्कुराई थी।
अपने सब गुण देकर मुझको,
दुगना आनंद मिला तुझे ।
कोई सर्वस्व देकर भी,
इतना धनवान हो सकता है
तुझको देखकर, हाँ, यह समझमे आता है।
कोई चाह नहीं रखी तूने,
कोई मोल लगाया नहीं कभी।
बस देना ही तो सिखाया तूने
प्यार भी और विश्वास भी।
आज सोचने जब बैठी हूं,
क्या मूल्य है इस सब का।
एहसास हुआ तब मुझको
तेरे प्यार का तो अंश भी नहीं चुका पाऊंगी।
कैसा नाता है यह तेरा मेरा,
दूर रहकर भी है सदैव एहसास तेरा।
हर रिश्ता है प्यारा मुझको
पर तुझको प्यार करती हूं मैं थोड़ा ज्यादा।
हाँ मां, तुझको प्यार करती हूं मैं थोड़ा ज्यादा
By Mona Mamtani

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