अंदाज़-ए-हुस्न
By Mahendra Dhirajlal Kamdar
देख कर शर्म-ओ-हया आपके, रूह जो बे-जान थी, बे-क़रार हो गई,
देखके नाज़-ओ-अंदाज़ आपके, कली जो रिंदान थी, शर्मसार हो गई,
क़यामत है हुस्नकी ये जल्वा-गरी, क़यामत आँखोंकी ये फ़ित्ना-गरी,
हज़ारों तमन्नाएँ इस दिल की, जो शबनम थी अबतक, शरार हो गई,
दहकते हुए इन रूख़सारोंपे, वल्लाह, कुछ बूँदें रुकी है, या-अल्लाह,
बिन मौसम बरसात की ये सारी, जो महज़ पानी थी, शराब हो गई,
रूख़सारोंकी लाली बता गई, जो राज़ आपकी झुकी नज़र छुपा गई,
इन्हीसे रंग चुरा कर, दिलकी वादीयोँमें, जो ख़िज़ाँ थी, बहार हो गई,
होंठोंपे इंकारका होना, आँखोंमें इज़हारसा होना, ओ जान-ए-जानाँ,
होंठों और आँखोंके बीच, जो रिश्तेदारी थी, अब कैसी दरार हो गई,
ज़ुल्फ़को आप जो लहराके चले, बदनकी ख़ुशबू जो बिखराके चले,
गुलोंकी भी क़िस्मत, जो रौशन थी अब तक, ख़ाना-ख़राब हो गई,
बागोंमें आप जो तन कर चले, नाज़ुक पाँवसे दिलोंको रौंद कर चले,
अब्सार आपकी, जो रहम-दिल थी, वोही जिगरके आरपार हो गई,
तेरे आनेसे जी बहाल हो गया, तेरे जानेसे भी तेराही ख़याल हो गया,
या-रब, हिज़्र क्या छा गई, तन्हाई जो रक़ीब थी, ग़म-गुसार हो गई,
'काफ़िर', नक़ाब जो रुखसे सरक गई, बुत-ख़ानेमें हलचल मच गई,
बंदों की क्या, ख़ुदा की भी निय्यत, जो बुलंद थी, तार-तार हो गई.
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

Comments