अंतर्ज्ञान
By Ishika Morolia
उंगलियों की सख्त पकड़ के बीचों-बीच एक स्थान हो जाता है,
जब रेत फिसलने को होती है, तो अंतर्ज्ञान हो जाता है!
आज तुम बूंदों को नज़रंदाज़ करना अज़माओगे,
कल सागर बन गया तो रोवोगे, मचलोगे पछ्ताओगे!
छोटी-छोटी बातें, जिनको खिड़की दी तुमने, तुम्हे ध्यान नही है,
बड़े-बड़े मुद्दे दिल में मेरे घर बना बैठे, तुम्हे अनुमान नही है!
आँखें बंद कर लेने से, गलत फ़हमियों का दिन ढलेगा नही,
जब सब बिगड़ेगा तब सब बिगड़ेगा, कुछ फिर संभलेगा नही!
आज झोंके को देख लापरवाही तुम्हारी चूकेगी नही,
जो तूफ़ान बन गयी कोई रूह तो फिर रुकेगी नही!
उस ही समय कोई थाम ले अगर तो इत्मीनान हो जाता है,
जब "रेत" फिसलने को होती है, अंतर्ज्ञान हो जाता है...!!
By Ishika Morolia

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