अंतरी अपदूत
By Harshita Gupta
राक्षस की तरह
तेरे पीछे ही मंडराता हुआ
तु खामोश नादान सा
गुमशुदा ही रहता है
पर ये दानव न शांत है
न इसका सही वक्त
न इसकी कोई पहचान है।
पर खौफ से तु न जी पाएगा
इस शैतान से तु न बच पाएगा,
ये तेरी आत्मा
तेरे अंतर
तेरे जीवन का इम्तेहान है।
तो चल अपनी मन की सादगी से
पिघला इन बेड़ियों को
तो चल अपनी मन की सादगी दिखा इस राक्षस को,
ज़रा पुण्य पाप के तराजू की नापतोल भी
सीखा इस राक्षस को।
इस मिट्टी से तेरा जन्म
इस मिट्टी में ही तु दफनेग
इस मिट्टी से तेरा क्रियाकर्म
और तेरे कर्मो का हिसाब भी तो होएगा।
संत न है तु
दुष्ट भी nhi
बस है तु एक मानव
पुण्य पाप के बीच की लकीर।
By Harshita Gupta

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