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अँगने की तुलसी

Oct 29, 2022
2 min read

By Suman Kumar


I१I

गांव के अंदर को आती है

पगडंडी सी एक सड़क

और उसके ऊपर

चारों ओर आम्र-मंज़रियों से

हरा-भरा एक बागीचा,

उस बगीचे के

बांसवाड़ी के ठीक बगल में

खड़ा है एक मकान

दो कमरों और आठ कोनों वाला,

उन आठ कोनों में से

एक कोना रोता है

हर रोज़ खून के आंसू,

जब हंस रहा होता है

ठहाके मार कर

उसी घर का आंगन,



डर से थरथर कांपती

सिसकियाँ लेती रोती है

अँगने की तुलसी,

उस रोते कोने से बहकर आये

रक्त-अश्रुओं की बाढ़ से

सिंचित होने का कर्ज चुकाने को,





धूप खिलता नहीं है

बगीचे में,

पर जो भी हो

खिलता जरूर है

हर रोज़ अँगने में

उस रक्त-नदी को

बस सुखाने को,



पौ फटने के पहले ही

धोकर खुद के रोने का

दाग मिटाता है वो कोना,

के देख ले न कोई

के ये कौन नाकोई-सा है

जो रोता है?



के सांस लेना

मुश्किल है अंदर के

इन दो कमरों में,

बाहर बहुत है ऑक्सीजन

अंदर कम है,

सो खिड़की पर

अपनी हाथों पर अपना

सिर टिकाये भरता है

वो कोना भरदम सांसे,

के अँगने का अट्हास लौटने से

पहले सिमटना है

उसी जंजीरबद्ध अंधेरे में

जहाँ ऑक्सीजन कम है,

सांसे भारी हैं

और भार बहुत.



I२I

अभी परसो ही कि तो बात है

के लाये थे तुम

मेरे नैहर की तुलसी उखाड़ कर,

लगा दिया था

इसी कोने में उल्लास से,

के वो रोता कोना हंसता था,

के वो अट्हास अँगने का मुस्काता था,

इठलाता था तारुण्य

आलिंगनों औ' प्रेमपाश में.



ये क्या हुआ

जब अँगने में एक तुलसी

जीवन्त हो खिलखिला उट्ठी?

क्या पाप था जो

उसको इस अँगने में

पनाह दी?

क्या उसको त्यज के

हंसी संभालती?

क्या जो उसको न त्यजा

तो तुम्हारा त्यागना मुझको

सही हुआ?



सही तुम्हारे लिये

समाज की उलाहना,

सहा मुस्कुरा के

तुम्हारे भी प्रियजनों की

दी हुई प्रताड़ना,

सहन किया तुम्हारे ही लिए

इस तरह के मातृत्व का दंश भी

(तुम्हारे अनुसार तो इस तरह का

मातृत्व दंश ही है ना!),

सह सके

न पति- न पिता

होने का दायित्व तुम,

के सह रही हूँ

उस द्विजा के लिए

तुम्हारा श्राप भी,

सींचती हूँ उसको

तुम्हारे दिए आंसू

घर के बर्तनों में

संग्राह कर,

के जब खिल उठेगी

खिलखिला के मेरी सुता,

तो स्वच्छंद होगी

मेरी दबी पड़ी मुस्कान भी

औऱ ऊंची उड़ेगी

इस नील गगन से

मेरी कामना।


By Suman Kumar






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