Zindagi Aur Waqt
By Kamini Kejriwal
कैसा है यह मन मेरा
कभी बच्चा है तो ,
कभी कच्चा है ,
क्या चाहता है समझ ,
भी तो नहीं पाता है ,
क्या करूं कैसे करूं ?
हर बार वही एक सवाल ?
सवाल कई पर जवाब वही,
कर वही जो मन चाहे ,
"पर "
यही तो समझ ना पाए "मन"
कि वह क्या चाहे ,
बातें और कितनी ही बाते
कभी लगता है बन जाऊं ,
अपने बाबा की वह
छोटी सी गुड़िया थी
जो रचाती थी ब्याह
गुड्डे और गुड़ियों का
अपनी सखियों के साथ
बनाती थी कल्पनाओं का
एक हसीन संसार
तभी मन लगा देता है एक डाॅट
और कहता है चल पगली छोड़ दे
यह दिल की गली
इसमें तो है सिर्फ दर्द ही दर्द
सुन थोड़ी अपने मन की भी
आवाज
सुनाता है जो तेरे लिए एक नई
झंकार
जिसमें बंधे हैं वह ख्वाब तेरे
देखे थे जिसे दिल ने तेरे
ना कर तू ये जोरा जोरी
और
पकड़ ले अपनी ही डोरी
लेले लगाम अपने ही हाथ
और
बांध दे उसको इस तरह की
तोड़ ना पाए फिर कोई तेरे
दिल की आवाज
कर ले ख्वाब वो सारे पूरे
जो देखे थे कभी तूने खुद के लिए
सुन के तो देख ,मन की आवाज, मिलेगी इसमें तुझे तेरी ही आवाज, कराएगी पहचान ये तेरी ही तुझसे यही तो है तेरी कल्पना का संसार
भर ले उड़ान
फैलालेअपनेपंखोकोतू
By Kamini Kejriwal

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