Zindagi
By Sofia Oberoi
क्यों, कब, क्या, कैसे
बहुत से हैं मन में सवाल ऐसे।
कोशिश कर रही हूँ बार-बार
फिर भी लगता है जैसे गई हूँ हार।
लेने हैं बहुत से फैसले अभी
क्या ले भी पाऊँगी उन्हें कभी।
क्या हो गई हूँ इतनी बड़ी कि सब निर्णय खुद ले लूं
काश कोई समझा दे कि इन सवालों का मैं क्या कर लूं।
चाहिए ना हो मुझे कोई, ऐसा खुद को बनाना है
क्या जरूरी है कि बेटी हूँ तो किसी ना किसी के घर जाना है?
क्यों चलूं आंखें नीचे कर? नहीं लगता मुझे किसी से डर
लोग क्या कहते हैं, नहीं है इस सब की फिकर।
सब सुनती हूं ,समझती हूँ ,बस बात है ये कि दिखाती नहीं
छत को घूरती, बिस्तर पर पलटती ,क्यूंकी रात को नींद है आती नहीं।
कैसे सो जाते हैं लोग दूसरों को रुला के
क्या उन्हें भी नहीं है मेरे सपने आते ?
अपना सब लुटा देती है तुझे संवारने के लिए औरत
फिर भी तेरी आँखों में वो रहती है बेगैरत।
नहीं सोचूंगी उसके लिए जो मेरे लिए ना सोचेगा
बन जाऊंगी एक पत्थर जो फिर तुम्हें भी खरोचेगा।
लेकिन दुर्भाग्य से मैं एक इंसान हूं,पत्थर होती तो क्या गम होता
ठोकर मार के जाते भी हो तो दर्द सिर्फ है मुझको होता।
सोचती हूँ सब छोड़ दूँ ना करूं कोई बात
हसी खुशी से जी लूं जिंदगी के ये दिन सात।
ना करूं किसी के लिए दुआ, ना करनी पड़े किसी की परवाह
मस्त मौला बन के जियूं, ना देनी पड़े इस मन में जगाह।
बस इतना ही चाहती हूं जिंदगी से
ज़्यादा कुछ ना माँगती मैं।
एक बार उठकर निकल जाऊँ
तो वापिस ना हूँ आती मैं।
By Sofia Oberoi

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