Zindaa
Updated: May 31, 2023
By Nitesh Mohan Verma
अपने ज़िंदा होने का एहसास चाहता हूँ
पर जब चीखता हूँ
दीवार से टकरा कर
मेरी आवाज़ वापस आती नही
ईंट-पत्थर का जँगल ये शहर
हाड़-माँस का दंगल ये शहर
रोज़ बढ़ता शोर
तुझ तक कोई मेरी बात जाती नही
दीवार से टकरा कर
मेरी आवाज़ वापस आती नही
रिश्तों से मँहगा रुपया हुआ
जाने क्यों ये तजुर्बा हुआ
चाकरी में यूँ रहा मशरूफ मैं
माँ भी याद आती नही
दीवार से टकरा कर
मेरी आवाज़ वापस आती नही
नये को पुराना कर
फिर नया खरीदने की होड़
ज़िन्दगी को हार कर
ज़िन्दगी जीतने की होड़
इस मोड़, उस मोड़
इस होड़ की है जोड़-तोड़
बस मोड़-मोड़ का सफर
मंज़िल नज़र आती नही
दीवार से टकरा कर
मेरी आवाज़ वापस आती नही
क्या है कोई मन्त्र तेरा?
क्या है कोई यन्त्र तेरा?
भेज दे वापस मुझे
वही पुरानी सी गली
मेरा वो छोटा शहर
जेब थोड़ी खाली तो क्या
कम भी हो रोटियाँ अगर
थक चुका मैं आम बन
मैं फिर से होना, ख़ास चाहता हूँ
मुस्कुरा कर जीने का
एक आखिरी, प्रयास चाहता हूँ
अपने ज़िंदा होने का, एहसास चाहता हूँ
पर जब चीखता हूँ
दीवार से टकरा कर
मेरी आवाज़ वापस आती नही
By Nitesh Mohan Verma

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