Wo Jeena Bhi Kya Jeena Ho
By Devendra Bhadauria
वो जी़ना भी, क्या जी़ना हो,
भग्न हृदय हो, आस नहीं हो,
डसने को विशधर, हो इतने,
अपने में विश्वास नहीं हो,
वो जी़ना भी, क्या जी़ना हो......
राह निपट हो, दूभर चलना,
कोई भी, अपने पास नहीं हो,
पल भर का ही, शेष हो जीवन,
और मुट्ठी में सांस नहीं हो,
वो जी़ना भी, क्या जी़ना हो......
यौवन की उत्ताल तरंगे, हाला हो,
पर जीवऩ में, प्यास नहीं हो,
वो जी़ना भी, क्या जी़ना हो......
मादक सा, मधुमास नहीं हो....
By Devendra Bhadauria

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