Vasl Ki Raatein
By Jwala
जो सुई भी गिरी तो हल्ला, होता इस कदर सन्नाटा है
रातों को हम दो जुगनू जब करते सैर-सपाटा हैं
जो सुई गिरी तो हल्ला…
जब अपनी-अपनी कोठी में सब दुबक खाट में सोते हैं
तब कहीं शून्य में नभगामी हम इक दूजे के होते हैं
बचने मज़हब की बेड़ी से हम छुप-छुप कर यूं मिलते हैं
जब चाँद गगन में जलता है दो सूर्य धरा पर खिलते हैं
हर शब कुछ ऐसे मिलते हैं हम, जैसे बरसों बाद मिले हैं
दुनिया से और दिनकर से, हम दोनों के बस यही गिले हैं
पर फिर आँखें मिलते ही कोई शिकवा पास न पाते हैं
इक दूजे की बाहों में कुर्बां हो जाना चाहते हैं
जब काँधे पर मिरे सर रख वो, मुझको बाहों में भरती है
अपने सुर्ख लबों को जब मिरे अधरों पर धरती है
उस पल को ऐसा लगता है कि रात नहीं क्यूँ थम जाती
पैगाम-ए-फ़िराक-ओ-हिजरत का गर सहर नहीं लेकर आती
तो इक दूजे की बाहों में हम ज़ीस्त यहीं बिता देते
लब तब तक जुदा नहीं होते जब तक ज़वाल न हो जाते
पर गुनाह-ए-इश्क़ कि जुर्रअत जो की तो खिरदमंदों से बचते हैं
औ’ रातों को, सन्नाटे में, छुप-छुप, छुप कर मिलते हैं
जहां नहीं कोई धर्म की बंदिश न ज़ात-पात के रोड़े हैं
जहां नहीं हर चार गाम पर जलालुद्दीन के घोड़े हैं
जहां नहीं कोई संत-मौलवी-पंडित-मोमिन आते हैं
उन निपट नग्न वीरानों में हम अपनी रात बिताते हैं
जब अर्श में तारे और अर्ज़ पर दरख़्त भी सारे सोते हैं
हम दो काफ़िर, इक दूजे के तब, जिस्मों में लिपटे होते हैं
और यूँ ही इक दूजे में गुम, शब सारी कट जाती है
वस्ल के बाद हिजरत का पैगाम सहर फिर लाती है
इक दूजे को समझाते हैं कि वस्ल की रातें और भी हैं
हाथ छुड़ा हम दो जुगनू मुड़ वापिस फिर उड़ जाते हैं
वो दैर गली को जाती है, मैं हरम राह को मुड़ता हूँ
हर शब मिलने का वादा कर, हर सहर यूँ ही बिछड़ता हूँ।।
By Jwala

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