Tutta Khwaab
By Karan Bardia
लग गई आग मेरे घर में बच्चा ही क्या है,
आगर बचा गया मैं तो समझो जला ही क्या है,
अपने कर्मों का फल है मुक़द्दर अपना,
वर्णा हाथों की लक्करों में रखा ही क्या है।
हार गया मैं जीवन में अब करने को बच्चा ही क्या है,
अगर मैं कुछ नहीं समझता उस हार से तो समझो हरा ही क्या है,
हर हार एक समझ है जीवन की,
वर्ना सिरफ सफल होने में रखा ही क्या है।
टूट गया विश्वास मेरा अब भरोसा करने के लिए बच्चा ही क्या है,
आंखें अगर नहीं खुली मेरी उस विश्वघाट से तो मैंने दुनिया को समझा ही कहां है,
अरे दुनिया और दुनियादारी तो बहुत जरूरी है जीवन में,
क्यूंकि सीधे खड़े रहने वाला पेड़ आज दुनिया में बच्चा ही कहां है।
ख़्वाब मुश्किल था टूट गया मेरा अब ख़्वाब देखने को रखा ही क्या है,
नींद अगर ना उड़ी मेरी उस टूटे ख्वाब से तो मैंने उस ख्वाब को पूरा करना चाहा ही कहां है,
अरे हर टूटा ख़्वाब एक नई उम्मेद की किरण का प्रतीक है,
वर्णा आसनी से होने वाले ख्वाबों में रखा ही क्या है।
By Karan Bardia

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