Tumhe Kya Bataun?
By Aryasilpa Das Adhikari
कितने दिनों से ये चाह थी
की तुम सामने आओ तो बताऊँ !
की तुम मिलो कभी
दोस्त बन,
मेरे घर आओ
तो बताऊँ।
ये तुम जो मुझे
भरी महफ़िल में
ऐसे ख़ारिज कर देते हो
और मेरे हर एक बात और विचार को
"फेमिनिस्ट" कहला के
जो नकार देते हो
और फिर उसी बात को
बंद बोर्ड रूम में
अपना सोच बता
समावेश और विविधता के
ध्वज वाहक बने , वह-वही जो बटोरते ह।
बहुत चाह है, खुले दिल से
बड़े सुकून से , तुम्हे बताऊ।
लेकिन, तुम्हे क्या बताऊँ!
की मेरी माँ
अपने दो नवजात बेटियों को खोने के बाद
मेरे ज़िंदा रहना के लिए कैसे लड़ी?
तुम्हे क्या बताऊँ?
कितनों का ताना सुन और सह कर
मुझे प्राइवेट अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाया ।
किसी को बिना बताये , कैसे
मेरे हाई-जम्प की जीत की खुशी
माँ बेटी ने बंद कमरे में मनाया।
और जब, स्पोर्ट्स निकर के साथ
मेरे छलांग लगते फोटो
दैनिक भास्कर में आया,
तब कैसे , घर के बुजुर्गों से
माँ ने मुझे बचाया।
तुम्हे क्या बताऊँ,
की कैसे माँ ने मेरी
कच्चे उम्र की शादी तोड़ी
और मुझे नौकरी के लिए
अपने से दूर, शहर भेज।
तुम्हे क्या बताऊँ,
जब किसी रेस में
मैं अव्वल आती हूँ या
फिर हार जाती हूँ
मुझे माँ की हर बार की बात याद आती है।
की बच्चे !
तुझे ये जो दुनिया देखती और
समझती है,
तू उससे कहीं बेहतर है -
दुनिया ने तेरी आज की
आधी अधूरी लड़ाई देखी है
पूरा जंग तो तूने लड़ा है।
बहुत मन था,
कभी शाम की धुंदली उजाले में
चाय की सिसकियाँ लेते
तुम्हे ये सब बताऊ।
लेकिन उस दिन
जब तुम्हारे चेहरे और
बाजुओं पर चोट के निशाने देखे
जब तुम्हे ऑफिस के वाशरूम में
फ़ोन पैर हलकी सिसकियाँ
लेते हुए, अपनी माँ से बात करते सुना
उस दिन,
मैंने अपने आप से कहा
की हाँ मैं फेमिनिस्ट हूँ
और मेरे इस फेमिनिज्म की ज़रूरत शायद
तुमको भी है ।
मुझे 'फेमिनिस्ट' बने रहना होगा
मुझे 'फेमिनिस्ट' बने रहना होगा
ताकि कोई और बेटी को
तुम्हारा दर्द न सहना होगा।
By Aryasilpa Das Adhikari

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