Tumhaari Aadat
By Arpit Pokharna
बहुत शाम मेरे ख़यालो को, तुम्हारी आदत ने संभाला है
भटकते राह तकते, अंधेरे गलियारों से, ले आई वहाँ, जहाँ उजाला है..
बुझे से, कुछ सुलगे, छटपटाते भी
कुछ आधे रास्ते मुड़ आए भी
सुबकते से, कुछ खिलखिलाते, मायूस भी
कुछ हक़ीक़तों से मिल आए भी
खर्राटे खींचते, कुछ करवटे बदलते, अधनिद्र भी
कुछ मौसमों में धुल आए भी
कि जिनके पैरो में ज़मीन कहाँ है और इरादों में यकीन कहाँ है हवा चले तो बिखरते है बिना बात के इतरते है कि जिनकी सुबहों में अब ओस नहीं खिलती कि जिनको जीने की भी ठोस वजह नहीं मिलती उन नाकारा, नालायक, बेहुदा ख़यालो को
तुम्हारी आदत ने संभाला है।।
By Arpit Pokharna

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