The Woman
By Anip Kumar
This is the poem dedicated to all the woman across the globe and for being the unique identity in themselves . For making this world beautiful , for working tirelessly day in day out both within four walls and outside and contributing immensely in the success stories. This is to salute womanhood ,with my utmost gratitude & thankfulness.
जीवन ज्योत जलाने वाली ,
दर्द सहकार भी जन्म देने वाली ,
अपनी ममता की छां तले ,
जीवन को सावारने वाली ,
तुझमे ही वास करती ,
जगत जन्नी माँ दूर्गा , माँ काली |
क्या है ऐसा जो तु नहीं करती ,
त्याग की हो मुरत तुम ,
तुझसे ही तो है ये प्रकृति |
कोमल भले हो काया तेरी ,
पर अटूट है तेरी इक्षाशक्ती ,
तेरी ही कला से सुन्दर है ये संपूर्ण शृष्टी |
माँ बनकर तूने चलना सिखाया ,
बहन बनकर हसना तो दोस्त बनकार जीना सिखाया ,
पत्नी बन साथ चलकर हर राह किया आसान ,
बेटी बनकर तूने ही तो रौशन किया मेरा जीवन ,
मेरे नाम से जुडकर तूने मुझको ही दिया सन्मान |
तु ही अपने प्रेम से सींचकर हर घर को सवारती ,
बजा अपने हूनर का डंका ,
समाज को नया राह दिखाती ,
हर मुशकिल को चीरकर ,
एक नया आयाम बनाती ,
कुन्दन सा है वयक्तित्वा तेरा ,
तपकर भी तु और निखर जाती |
शिव की शक्ति हो तुम , कृष्ण की हो राधा ,
हम सब मे प्रकृति -पुरूष दोनो है आधा -आधा ,
भिन्न नहीं पुरूष और नारी का वजूद ,
हर पुरूष मे बस्ती है एक नारी ,
हर नारी मे भी है पुरूष मौजूद |
भेद नहीं दोनो मे , हम है एक समान ,
आओं मिलकर करे एक दुजे का सम्मान ,
मिलकर मिटाये कुरितियो को हम ,
करे एक नए समाज का निर्माण |
By Anip Kumar

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